बस्तर दशहरा में दो देवियों का पावन मिलन, मावली माता की डोली देखने उमड़े हजारों श्रद्धालु
जगदलपुर। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और सदियों पुरानी धार्मिक आस्था का प्रतीक मावली परघाव मंगलवार देर रात पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ।

जगदलपुर। बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और सदियों पुरानी धार्मिक आस्था का प्रतीक मावली परघाव मंगलवार देर रात पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। दंतेवाड़ा से मावली माता की डोली और छत्र के जगदलपुर पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने भव्य स्वागत किया। मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में आयोजित इस विशेष अनुष्ठान को देखने के लिए हजारों लोग पहुंचे। फूलों की वर्षा, आतिशबाजी और माता के जयकारों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्मों में शामिल मावली परघाव स्थानीय लोगों के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी विरासत और परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी है।
दंतेवाड़ा से पहुंचीं माता, पारंपरिक तरीके से हुआ स्वागत
मावली माता की डोली और छत्र को परंपरा के अनुसार दंतेवाड़ा से जगदलपुर लाया गया। मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने माता की अगवानी की। स्वागत के दौरान फूलों और आतिशबाजी ने आयोजन की भव्यता बढ़ा दी।
डोली के आगमन की खबर के साथ ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। लोग माता के दर्शन करने और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनने के लिए उत्साहित दिखाई दिए। देर रात तक परिसर में धार्मिक उल्लास का माहौल बना रहा।
छह सदियों से जुड़ी है मावली परघाव की परंपरा
बस्तर की ऐतिहासिक परंपराओं में मावली परघाव का विशेष स्थान है। मान्यता है कि यह रस्म लगभग 600 वर्षों से निभाई जा रही है। इसका संबंध बस्तर रियासत के इतिहास और राजपरिवार की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
कहा जाता है कि महाराजा रुद्र प्रताप देव के समय से मावली माता की डोली के स्वागत की परंपरा चली आ रही है। पीढ़ियों से चली आ रही यह रस्म आज भी उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जाती है। यही वजह है कि मावली परघाव बस्तर दशहरा के सबसे महत्वपूर्ण आयोजनों में गिना जाता है।
कर्नाटक से बस्तर तक पहुंची देवी की आस्था
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, मावली माता का मूल स्थान कर्नाटक का मलवल्ली गांव माना जाता है। मान्यता है कि छिंदक नागवंशीय राजाओं के शासनकाल में देवी बस्तर पहुंचीं। इसके बाद चालुक्य राजा अन्नम देव ने बस्तर में अपना राज्य स्थापित करने के बाद मावली माता को कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया।
देवी के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करने के लिए शुरू हुई मावली परघाव की रस्म समय के साथ बस्तर दशहरा की विशिष्ट पहचान बन गई। यह परंपरा आज भी क्षेत्र के लोगों को अपनी धार्मिक जड़ों और ऐतिहासिक विरासत से जोड़े हुए है।
नंगे पांव पहुंचते हैं राजपरिवार के सदस्य
मावली परघाव के दौरान राजपरिवार, राजगुरु और पुजारियों की भूमिका परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण रहती है। मान्यता के अनुसार, नवमी के दिन राजपरिवार के सदस्य नंगे पांव राजमहल से मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर तक पहुंचते हैं और विधि-विधान से माता की अगवानी करते हैं।
पूजा-अर्चना के बाद मावली माता की डोली को कंधों पर उठाकर राजमहल स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में विराजित किया जाता है। बस्तर दशहरा के समापन पर डोली को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में परंपरागत रीति-रिवाजों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
रावण दहन से अलग है बस्तर दशहरा की पहचान
देश के अधिकांश हिस्सों में दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, लेकिन बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराओं और लंबे उत्सव के कारण अलग पहचान रखता है। इसमें देवी आराधना, जनजातीय संस्कृति, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और सामुदायिक सहभागिता प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
मावली परघाव इसी अनूठी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। माता की डोली के स्वागत में उमड़ी भीड़ ने दिखाया कि आधुनिक समय में भी बस्तर के लोगों का अपनी परंपराओं और आस्था से गहरा जुड़ाव बना हुआ है। श्रद्धा और उत्साह के बीच संपन्न हुई यह रस्म बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर सामने लेकर आई।




