बस्तर दशहरा में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जनजातीय संस्कृति को सराहा, मांझियों और चालकी के मानदेय में बढ़ोतरी
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने वाले विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शामिल हुईं।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने वाले विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शुक्रवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शामिल हुईं। जगदलपुर में आयोजित इस समारोह में उन्होंने जनजातीय समाज की परंपराओं, सामूहिक भागीदारी और सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा की। राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने वाली अनूठी परंपरा है।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बस्तर में हो रहे बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि माओवाद से मुक्त होकर यह क्षेत्र अब विकास और पुनर्निर्माण की नई राह पर आगे बढ़ रहा है। कार्यक्रम में बस्तर की पारंपरिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों के लिए मानदेय बढ़ाने की जानकारी भी सामने आई। अब मांझियों को 5,000 रुपये और चालकी को 3,500 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे।
सदियों पुरानी परंपराओं और सामूहिक आस्था का प्रतीक है बस्तर दशहरा
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर दशहरा की विशिष्टता का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव देश के अन्य त्योहारों से अलग पहचान रखता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता विभिन्न समुदायों की सक्रिय भागीदारी है, जिसके जरिए सांस्कृतिक परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि रथ बनाने से लेकर उसे खींचने, धार्मिक अनुष्ठान करने और पूजा-पाठ तक हर समुदाय अपनी परंपरागत भूमिका निभाता है। इस तरह का सामूहिक प्रयास समाज में आपसी सहयोग, विश्वास और एकता को मजबूत करता है।
मुरिया दरबार में दिखती है लोकतांत्रिक संवाद की परंपरा
बस्तर दशहरा से जुड़े मुरिया दरबार को राष्ट्रपति ने लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रभावशाली मिसाल बताया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर सामाजिक समस्याओं और जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा करते हैं।
राष्ट्रपति के अनुसार, संवाद के जरिए समाधान निकालने की यह व्यवस्था बताती है कि लोकतंत्र की भावना केवल संस्थाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की पारंपरिक व्यवस्थाओं में भी इसकी गहरी जड़ें हैं। सभी की बात सुनना और सामूहिक सहमति से आगे बढ़ना भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता है।
जनजातीय युवाओं को मिले अवसर, खेलों में भी आगे बढ़े बस्तर
राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रतिभा पर भरोसा जताते हुए कहा कि उचित संसाधन और अवसर मिलने पर यहां के युवा हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर सकते हैं। उन्होंने बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों की सराहना की।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का मंच भी प्रदान करते हैं। खेलों में बेहतर सुविधाएं और प्रोत्साहन मिलने से बस्तर के खिलाड़ी भविष्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
जंगल और पर्यावरण की रक्षा का किया आह्वान
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति के प्रति आस्था को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि जंगल, पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन जनजातीय जीवनशैली के अभिन्न अंग हैं।
राष्ट्रपति ने लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और वनों को सुरक्षित रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार और जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी स्वच्छ पर्यावरण और जैव विविधता का लाभ मिल सके।
उन्होंने दंडकारण्य, भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी से जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियों का उल्लेख करते हुए बस्तर की विरासत को भारतीय परंपरा का अहम हिस्सा बताया।
मुख्यमंत्री साय ने गिनाईं विकास की प्राथमिकताएं
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि उनकी उपस्थिति से बस्तर के लोगों में उत्साह का संचार हुआ है। उन्होंने कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए क्षेत्र में विकास के नए अवसर तैयार करना राज्य सरकार की प्राथमिकता है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि नियद नेल्लानार, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन जैसी योजनाओं के माध्यम से दूरस्थ गांवों तक सरकारी सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही सड़क संपर्क, रेल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और पर्यटन के विस्तार पर भी काम हो रहा है।
उन्होंने कहा कि बस्तर में शांति और विकास की प्रक्रिया को मजबूत करते हुए स्थानीय लोगों को रोजगार, बेहतर सुविधाएं और आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।
मांझियों को अब 5,000 और चालकी को मिलेंगे 3,500 रुपये प्रतिमाह
बस्तर दशहरा के दौरान पारंपरिक प्रतिनिधियों के मानदेय में वृद्धि का फैसला भी चर्चा में रहा। संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने बताया कि बस्तर की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने वाले प्रतिनिधियों के मानदेय में बढ़ोतरी की गई है।
नई दरों के अनुसार:
मांझी: 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रतिमाह।
चालकी: 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये प्रतिमाह।
यह बढ़ोतरी उन पारंपरिक पदाधिकारियों के योगदान को सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक व्यवस्थाओं और बस्तर दशहरा की परंपराओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
राज्यपाल रमेन डेका ने भी बताई सामूहिकता की अहमियत
राज्यपाल रमेन डेका ने बस्तर दशहरा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र की भावना देश की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में समाहित है।
उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा में अलग-अलग गांवों और समुदायों की भागीदारी सामाजिक समरसता का उदाहरण है। रथ निर्माण और संचालन जैसे कार्यों में लोगों की साझा जिम्मेदारी यह संदेश देती है कि आपसी संवाद और सहयोग से समाज को मजबूत बनाया जा सकता है।
सांस्कृतिक विरासत के साथ विकास की ओर बढ़ता बस्तर
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मौजूदगी में आयोजित बस्तर दशहरा समारोह में जनजातीय संस्कृति के संरक्षण, पर्यावरण की सुरक्षा, युवाओं की प्रतिभा और क्षेत्र के विकास पर विशेष जोर रहा। कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, वन मंत्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, सांसद महेश कश्यप सहित कई जनप्रतिनिधि, अधिकारी और पारंपरिक समुदायों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।
इस आयोजन ने एक बार फिर बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को सामने रखा। साथ ही पारंपरिक प्रतिनिधियों के सम्मान और क्षेत्र में विकास की संभावनाओं को आगे बढ़ाने का संदेश भी दिया।




